motivational kahani

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सुबह से ही सन्नाटा छाया हुआ था और वातावरण में बोझिलता थी। किसी बड़े ध्वनि की आवाज उन्हें मन ही मन चौका रही थी। वे बिस्तर से उठकर मैदान में आ गए। समाचार पत्र पढ़ने लगे। और अचानक एक ही स्थान में ही उनकी नजरे टिकी हुई थी।


 उनके सच्चे How increase positive energy मित्र रामप्रशाद बाबू की मृत्यु के खबर छपी हुई थी। अभी दो दिन पहले उनसे मुलकात हुई थी। स्वस्थ लग रहे थे , ताबियत  सही लग रही थी। परन्तु अचानक क्या हो गया ?

ऐसा सोच , उन्होंने तुरंत अख़बार रखा और जाने की तैयारी करने लगे। और अपनी बेटी मंशा द्वारा दी हुई चाय तक नहीं पी। और उदास मन लेकार पैरों में चप्पल पहनकर निकल गए। 

उनके अंदर का दर्द काम नहीं हो रहा था। और हर बार उनके मित्र का चेहरा दिलो दिमाग में आ रहा था। How to control your mind . 

परन्तु ,उनके मन में एक बात कचोट रही थी , कि वो अपने मित्र की एक इच्छा पूरी नहीं कर सके। इसका उन्हें बहुत पछतावा था ,  जिसका हथौड़ा उनके दिल को घायल किये जा रहा था कि एकमात्र वही  बचपन का साथी था। 

उन्होंने साथ साथ पढाई लिखाई , नौकरी , और गृहस्थी भी चलाई। परन्तु आज वह उसका साथ छोड़कर चला गया। 

उनके परम khud ko procare kaise rakhe मित्र अयोध्या की  इच्छा थी कि चौक में जो उनका जमीन का टुकड़ा पड़ा है, उसमे एक भव्य मंदिर का निर्माण हो।  उनको वे वचन भी दे  चुके  थे। लेकिन उनके पुत्र  रुपेश के  आगे   कुछ  नहीं कर सके। 

उनके एक बेटा और एक बेटी थी। बेटी अपाहिज थी। और पत्नी बीमार रहा करती थी। रुपेश विद्यालय की पढाई तक अच्छा रहा। वो अपने बेटे को हर प्रत्येक जरूरतमंद में उसे रुपये दे दिया करते थे। 


किन्तु जब जीवन में चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए वह इंजीनियरिंग की पढाई के लिए कॉलेज में अपना दाखिला करा लिया तब से वह बुरेसंगत में पड़ गया। और वह तब से किसी की बातो को नहीं सुनता था। और पिता भी क्या कर सकते थे , आखिर उन दोनों के आलावा उनका अब है ही कौन है। 

और इसी कष्ट को वो हमेशा अपने सीने में लिए रहते थे। और अपने मन मर्जी से शादी कर  के बाद वह अब और भी उनकी बातो को नहीं सुनता था। शायद इसका एक कारण ये motivational speech in hindi भी रहा हो की उनकी बहु के चेहरे में कूटिनीति झलकती थी। 

और तब से वो और भी टूट गए। और उनके भीतर का दर्द कभी कम नहीं हुआ। ये घर , दुकान , उन्होंने अपने मेहनत से कड़ी थी और आज ये इनके मालिक बन बैठे।

सत्तर वर्ष पार हो आखिर एक अच्छा student बने कैसे जाने के कारण खाने - पीने में कोई रूचि नहीं रही। परन्तु कभी  इच्छा होने पर खीर और पकौड़े इत्यादि बनाने को कहते तो , लेकिन खा न पाते। वैसे तो रसोईघर के साथ - साथ घर पूरा काज काम उनकी अपाहिज पुत्री मंशा ही किया करती थी। 

किन्तु  फिर भी घर में बहु ही राज और मालिकाना चलाती। रुकना मना है //जीवन में कैसे - कैसे धोके मिले। और बीमार पत्नी के समक्ष बैठते तो आँखों से आंसू  बहने लगते। 


शिक्षा  :- जमाना इस तरह बदलेगा उन्हें यह उम्मीद नहीं थी। उनका अधिकांश समय अयोध्या के समीप ही गुजरता था। प्रतिदिन सुबह - शाम अयोध्या के साथ रहकर कुछ सुकून मिलता। 



 "जीवन एक संघर्ष "कामयाबी की उड़ान  लेकिन आज वो किसके साथ अपना वक्त गुजारेंगे। उनका हमसफ़र मित्र उनसे विदा ले चूका है। और उनकी ख्वाइश भी पूरी नहीं हो सकी। 

चौक का टुकड़ा अभी भी वीरान पड़ा था। पता नहीं प्यार का मौसम न जाने फिर कब आएगा। 


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