#आहार सम्बन्धी जानकारी|sanlulit aahar kaise le| Tips for healthy food plan|

#आहार सम्बन्धी जानकारी|sanlulit aahar kaise le| Tips for healthy food plan|



स्वस्थ और निरोग होने के लिए आहार - विहार का बहुत महत्व है। बिना स्वास्थ्यवर्धक भोजन के बिना कभी - भी मनुष्य पुष्ट और बलशाली नहीं हो सकता है। और इसके  दीर्घायु होने के लिए IMPORTANT DRY-FRUITS अलावा काफी मात्रा में शारीरिक परिश्रम , विश्राम और निद्रा से भी शरीर स्वस्थ बना रहता है। व्यायाम तथा योगासन से जहाँ शरीर में स्फूर्ति बनती है , वहीँ मन में  शांति और प्रसन्नता का अनुभव होता है। 

aahar sambandhi niyam

स्वस्थ और सौंदर्य के सन्दर्भ में आहार का पहला स्थान है। आहार से स्वस्थ कैसे रहें जीवन की शुरुआत होती है। आहार से ही शरीर का  विकास होता है। आहार से ही चेहरे में सौंदर्यता में निखार आता है। गर्भाशय में रज एवं वीर्य के मिलन से मनुष्य का सृजन होता है। और उसके द्वारा प्राप्त रसाहार से गर्भाशय में शिष्य का सही आकार बनता है। 


आहार सम्बन्धी जानकारी- Tips for health


पाचन और पुष्टिकरण का यह क्रम जैसे - जैसे बढ़ता जाता है , बालक का शरीर अधिकाधिक् भरता चला जाता है।  और वह  सुन्दर होने लगता है। संक्षेप में आहार का मतलब है कि - पौष्टिक पदार्थो का सेवन एवं पचन। भोजन सदैव उतना ही करना चाहिए , जितना की खाने के   बाद पेट भारी न समझ में न आये। ऐसा भोजन करने से चलने , फिरने और बैठने में किसी भी प्रकार की तकलीफ नहीं हटी है। 

प्रत्येक व्यक्ति को अपने समय के अनुसार भोजन का समय निर्धारित  चाहिए। हरी सब्जिओ का सेवन करना चाहिए , और दूषित खाना खाने से बचना चाहिए। हमेशा जहाँ तक संभव हो , सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त के पश्चात भोजन ने करें। भोजन करने से पहले मुँह और आखें बंद करके  एक मिनट मन ही मन प्रभु के सौंदर्य का चिंतन करना चाहिए। और धन्यवाद करके भगवान् को सहृदय स्मरण करना चाहिए। 


श्रम और विहार 


सदैव स्वस्थ और निरोग रहने में श्रम और विहार का बहुत महत्व है। विहार से न केवल थकान दूर होता है , बल्कि मानशिक शांति से छुटकारा दिलाता है।  और इसके द्वारा प्रसन्नता और सौंदर्यता भी मिलता है। जो लोग अधिक मानसिक कार्य करते हैं , उन्हें शारीरक श्रम भी अवश्य  सुखमय जीवन के 18 सुनहरे सिद्धांत करना चाहिए। मानसिक और शारीरक दोनों प्रकार के स्वस्थ्य एवं निरोगिता के लिए व्यक्ति को सदैव ही विहार से लगाव होना चाहिए। 



विहार के प्रमुख अंग निम्न है:- 




हास्य , विनोद और भ्रमण। हँसी मनुष्य को प्रकृति की तरह सुन्दर और निर्मल बनता है। और हसना और मुस्कुराना सभ्यता , सुसंस्कृति एवं सुसंस्कार के लक्षण हैं। और जो लोग हँसते  नहीं , मुस्कुराते नहीं वे निश्चय ही असभ्य संस्कृति शून्य तथा कुसंस्कारी होते हैं। 





इसी प्रकार हास्य से शरीर का प्रत्येक कण स्वस्थ और प्रफुल्लित होता है। जबकि मुस्कान से वे शरीर के रसों और धातुओं को शोधन होता है। तथा विनोद वह अमृत है , जो मस्तिक और हृदय में संजीवनी का संचार करता है। यह याद रखना चाहिए कि - विनोद में निर्मलता , कोमलता और मृदुता का निवास होता है। विनोद में सौजन्य ,स्नेह और सौहाद्र निहित होता है। 



तथा इसी प्रकार भ्रमण करने से शरीर कर संतुलन बनता है एवं शरीर हल्का रहता है। तथा मनुष्य के वातादि दोष , अग्नि - धातु  और मल सामान होते हैं। जो रुकना मना है अपने शरीर के अनुशार क्रिया करता हो , तथा जिसका शरीर इन्द्रियां एवं मन प्रसन्न हो वह स्वस्थ एवं निरोग समझा जाता है। 


संसार में निरोग रहने के बराबर कोई दूसरा सुख नहीं है। धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष इन चारो पदार्थो का जड़ निरोगिता है। जो लोग धर्मपरायण है , वे शरीर को ही धर्म आदि का मुख्य साधन समझते हैं। शरीर के ठीक न रहने से किसी काम में मन नहीं लगता तथा रोगी को कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। 







आहार क्या है ? Tips for healthy food plan

धन , पुत्र और स्त्री आदि जितने भी सुख हैं , उनमे निरोगिता प्रमुख है। Story In Hindi जो लोग आरोग्यता चाहते हैं , सदा स्वस्थ रहकर जीवन बिताने चाहते हैं , उन्हें सूर्योदय से चार घड़ी पूर्व बिस्तर छोड़ देना चाहिए। स्वस्थ निरोग मनुष्य अपने जीवन के रक्षा के लिए चार घड़ी तड़के उठे। 

विद्यवानो का कहना है कि - जो लोग रात के नव - दस बजे सोकर प्रातः सूर्योदय से पहले अपना बिस्तर छोड़ देते हैं , उनका शरीर सदैव निरोग रहता है। और उनकी विद्या बुद्धि भी बढ़ती है। सूर्योदय के समय को अमृतवेला  भी कहते हैं। 



इस समय की वायु बहुत सुहावनी और स्वस्थ्य के लिए अमृत के समान होती है। उससे शरीर में तेज और बल का संचार होता है। कार्य में लगन पैदा होती है। शरीर में फुर्ती आती है। आरोग्य और सुख चाहने वाले मनुष्य को प्रातः शीघ्र उठना बहुत जरुरी है। 



क्योंकि दिन चढ़े उठने से आरोग्यता नष्ट हो जाती है। मन मलिन रहता है। सुस्ती और  आलस्य घेरे रहते हैं। तथ कार्य आदि में मन नहीं लगता। सुबह जल्दी उठने के अलावा प्रातः भ्रमण करना भी स्वास्थ्य और सौंदर्य प्राप्ति का उत्तम साधन है। 


आहार संबंधी दिनचर्या - जीवनशैली 

प्रातः भ्रमण  का सर्वोत्तम समय है , सूर्योदय के एक घंटा पूर्व से सूर्यादय के एक घंटा के बाद तक। प्रातः भ्रमण के लिए सूर्योदय की दिशा की ओर जाना चाहिए। तथा लौटते समय पश्चिम की ओर मुँह कर लेना चाहिए। ताकि जाते हुए सूर्य की किरणे वक्ष पर पड़े और लौटे  हुए पीठ पड़े। 

इससे बातें छोटी मगर जरूरी रक्त तथा धातुओं के शोधन के साथ - साथ बुद्धि का विकास , नेत्र ज्योति वर्धन , त्वचा में निखार तथा जठराग्नि का प्रज्ज्वलन होता है। प्रातः भ्रमण के साथ - साथ भ्रमण प्राणायाम भी  किया जाए तो फेफड़ो का प्रत्येक छिद्र सर्वथा खुला रहता है। 


 प्राण , व्यान और अपान की गति पूर्णतया सुस्थिर एवं स्वस्थ रहते हैं। तथा ह्रदय की गति भी स्थिर और समान  रहती है।   इस प्रकार करने से स्वास्थ्य सही रहता है। तथा निरोगिता बानी रहती है। तथा मन प्रसन्न और उत्साह से भर जाता है। तथा अंदर से ताकत आ जाती है और शरीर में फुर्तीलापन आ जाता है। 




Post a Comment

please do not enter any spam link in the comment box